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श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 233: द्रौपदीका सत्यभामाको सती स्त्रीके कर्तव्यकी शिक्षा देना  »  श्लोक 58
 
 
श्लोक  3.233.58 
प्रथमं प्रतिबुध्यामि चरमं संविशामि च।
नित्यकालमहं सत्ये एतत् संवननं मम॥ ५८॥
 
 
अनुवाद
सत्ये! मैं प्रतिदिन सबसे पहले उठती और सबसे अंत में सोती थी। पति के प्रति यही भक्ति और सेवा ही मेरा वशीकरण मंत्र है॥ 58॥
 
Satye! I used to wake up first and sleep last every day. This devotion and service to my husband is my Vashikaran Mantra.॥ 58॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)