श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 233: द्रौपदीका सत्यभामाको सती स्त्रीके कर्तव्यकी शिक्षा देना  »  श्लोक 55
 
 
श्लोक  3.233.55 
तमहं भारमासक्तमनाधृष्यं दुरात्मभि:।
सुखं सर्वं परित्यज्य रात्र्यहानि घटामि वै॥ ५५॥
 
 
अनुवाद
मुझ पर जो भार रखा गया था, उसे दुष्ट स्वभाव वाले स्त्री-पुरुष भी नहीं उठा सकते थे। परन्तु मैं सब प्रकार के सुखों और भोगों का त्याग करके दिन-रात इस कठिन भार को उठाने का प्रयत्न करता था॥ 55॥
 
‘The burden that was placed on me could not be borne by men and women with evil nature. But I used to give up all kinds of pleasures and enjoyments and tried day and night to bear this difficult burden.॥ 55॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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