श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 233: द्रौपदीका सत्यभामाको सती स्त्रीके कर्तव्यकी शिक्षा देना  »  श्लोक 41
 
 
श्लोक  3.233.41 
नैतामतिशये जातु वस्त्रभूषणभोजनै:।
नापि परिवदे चाहं तां पृथां पृथिवीसमाम्॥ ४१॥
 
 
अनुवाद
मैं अपनी सास से बढ़कर वस्त्र, आभूषण और भोजन आदि में कभी कोई विशेष वस्तु नहीं रखती। मेरी सास कुन्तीदेवी पृथ्वी के समान क्षमाशील हैं। मैं कभी उनकी निन्दा नहीं करती॥ 41॥
 
‘I never keep any special thing for myself as compared to my mother-in-law in clothes, ornaments and food etc. My mother-in-law Kuntidevi is as forgiving as the earth. I never criticise her.॥ 41॥
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by AmritChaitanyaDas