श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 233: द्रौपदीका सत्यभामाको सती स्त्रीके कर्तव्यकी शिक्षा देना  »  श्लोक 39
 
 
श्लोक  3.233.39 
अवधानेन सुभगे नित्योत्थिततयैव च।
भर्तारो वशगा मह्यं गुरुशुश्रूषयैव च॥ ३९॥
 
 
अनुवाद
‘सत्यभामा! मैं सदैव प्रातःकाल उठकर उचित सेवा के लिए तत्पर रहती हूँ। अपने से बड़ों की सेवा के कारण ही मेरे पति मुझ पर कृपालु रहते हैं॥ 39॥
 
‘Fortunate Satyabhama! I always get up carefully in the morning and remain ready for proper service. It is because of the service of my elders that my husband remains favorable to me.॥ 39॥
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by AmritChaitanyaDas