| श्री महाभारत » पर्व 3: वन पर्व » अध्याय 233: द्रौपदीका सत्यभामाको सती स्त्रीके कर्तव्यकी शिक्षा देना » श्लोक 38 |
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| | | | श्लोक 3.233.38  | अहं पतीन्नातिशये नात्यश्ने नातिभूषये।
नापि श्वश्रूं परिवदे सर्वदा परियन्त्रिता॥ ३८॥ | | | | | | अनुवाद | | मैं अपने पति के सोने से पहले कभी नहीं सोती, उनसे पहले कभी भोजन नहीं करती, उनकी इच्छा के विरुद्ध कभी कोई आभूषण नहीं पहनती, सास की कभी निंदा नहीं करती और अपने को सदैव वश में रखती हूँ॥ 38॥ | | | | ‘I never go to sleep before my husband goes to bed, I never eat before them, I never wear any jewellery against their wishes, I never criticise my mother-in-law and I always keep myself under control.॥ 38॥ | | ✨ ai-generated | | |
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