श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 233: द्रौपदीका सत्यभामाको सती स्त्रीके कर्तव्यकी शिक्षा देना  »  श्लोक 37
 
 
श्लोक  3.233.37 
पत्याश्रयो हि मे धर्मो मत: स्त्रीणां सनातन:।
स देव: सा गतिर्नान्या तस्य का विप्रियं चरेत्॥ ३७॥
 
 
अनुवाद
मैं तो पति के संरक्षण में रहना ही स्त्रियों का सनातन धर्म मानती हूँ। पति ही उनका ईश्वर है और पति ही उनका भाग्य है। पति के अतिरिक्त स्त्री का कोई दूसरा आश्रय नहीं है। ऐसे पति को कौन स्त्री नापसंद करेगी?॥37॥
 
‘I believe that living under the protection of the husband is the eternal religion of women. The husband is their god and the husband is their destiny. A woman has no other support except her husband. Which woman would dislike such a husband?॥ 37॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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