श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 233: द्रौपदीका सत्यभामाको सती स्त्रीके कर्तव्यकी शिक्षा देना  »  श्लोक 34-35
 
 
श्लोक  3.233.34-35 
भिक्षाबलिश्राद्धमिति स्थालीपाकाश्च पर्वसु।
मान्यानां मानसत्कारा ये चान्ये विदिता मम॥ ३४॥
तान् सर्वाननुवर्तेऽहं दिवारात्रमतन्द्रिता।
विनयान्नियमांश्चैव सदा सर्वात्मना श्रिता॥ ३५॥
 
 
अनुवाद
‘मैं दिन-रात आलस्य त्यागकर दान-पुण्य, बलिवैश्वदेव, श्राद्ध, उत्सवों में होने वाले स्थलीपाकयज्ञ, पूजनीय व्यक्तियों का आदर-सत्कार, विनय, नियम और मुझे ज्ञात अन्य समस्त धार्मिक क्रियाओं को पूर्ण तत्परता से करता हूँ।॥ 34-35॥
 
‘Day and night, abandoning laziness, I perform alms-charity, Balivaishwadeva, Shraddha, Sthalipakayagya performed during festivals, respect and hospitality to respected persons, humility, rules and all other religious practices known to me, with full readiness.॥ 34-35॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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