श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 233: द्रौपदीका सत्यभामाको सती स्त्रीके कर्तव्यकी शिक्षा देना  »  श्लोक 3-5
 
 
श्लोक  3.233.3-5 
कथयामासतुश्चित्रा: कथा: कुरुयदूत्थिता:।
अथाब्रवीत् सत्यभामा कृष्णस्य महिषी प्रिया॥ ३॥
सात्राजिती याज्ञसेनीं रहसीदं सुमध्यमा।
केन द्रौपदि वृत्तेन पाण्डवानधितिष्ठसि॥ ४॥
लोकपालोपमान् वीरान् पुन: परमसंहतान्।
कथं च वशगास्तुभ्यं न कुप्यन्ति च ते शुभे॥ ५॥
 
 
अनुवाद
कुरुकुल और यदुकुल से सम्बन्धित अनेक विचित्र बातें उनकी चर्चा का विषय थीं। भगवान श्रीकृष्ण की प्रिय रानी सत्राजित कुमारी सुन्दरी सत्यभामा ने द्रौपदी से एकान्त में इस प्रकार पूछा - 'शुभकामनाएँ! द्रुपदकुमारी! तुम किस आचरण से बलवान, सुदृढ़ अंगों वाले तथा जगत् के रक्षकों के समान वीर पाण्डवों के हृदय पर अधिकार रखती हो? तुम्हारे वश में रहते हुए भी वे तुम पर कभी क्रोध क्यों नहीं करते?' 3-5॥
 
Many strange things related to Kurukula and Yadukul were the subject of their discussion. Lord Shri Krishna's beloved queen Satrajit Kumari Sundari Satyabhama privately asked Draupadi thus - 'Good luck! Drupadakumari! By what behavior do you have authority over the hearts of the Pandavas, who are strong and have strong limbs and are brave like the protectors of the world? How come they never get angry at you despite being under your control? 3-5॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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