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mahabharat 3.233.28: मैं अपने पति के ठट्ठों के अतिरिक्त और किसी पर नहीं हंसती। मैं बार-बार द्वार पर खड़ी नहीं रहती। मैं कूड़ा-कचरा फेंकने वाले गंदे स्थानों पर अधिक देर तक नहीं रुकती। मैं बगीचों में अधिक देर तक अकेली नहीं घूमती।॥28॥   |   mahabharat अध्याय 3.233: द्रौपदीका सत्यभामाको सती स्त्रीके कर्तव्यकी शिक्षा देना   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 233: द्रौपदीका सत्यभामाको सती स्त्रीके कर्तव्यकी शिक्षा देना  »  श्लोक 28
 
 
श्लोक  3.233.28 
अनर्म चापि हसितं द्वारि स्थानमभीक्ष्णश:।
अवस्करे चिरस्थानं निष्कुटेषु च वर्जये॥ २८॥
 
 
अनुवाद
मैं अपने पति के ठट्ठों के अतिरिक्त और किसी पर नहीं हंसती। मैं बार-बार द्वार पर खड़ी नहीं रहती। मैं कूड़ा-कचरा फेंकने वाले गंदे स्थानों पर अधिक देर तक नहीं रुकती। मैं बगीचों में अधिक देर तक अकेली नहीं घूमती।॥28॥
 
‘I do not laugh except at the jokes made by my husband. I do not stand at the door again and again. I do not stay for long in dirty places where rubbish is thrown. I do not roam alone for long in the gardens.॥ 28॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)