श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 233: द्रौपदीका सत्यभामाको सती स्त्रीके कर्तव्यकी शिक्षा देना  »  श्लोक 25
 
 
श्लोक  3.233.25 
क्षेत्राद् वनाद् वा ग्रामाद् वा भर्तारं गृहमागतम्।
अभ्युत्थायाभिनन्दामि आसनेनोदकेन च॥ २५॥
 
 
अनुवाद
‘जब कभी मेरे पति खेत, वन या गांव से घर लौटते हैं, तब मैं खड़ी होकर उनका स्वागत करती हूँ; तथा उनके स्वागत के लिए उन्हें आसन और जल देती हूँ।॥ 25॥
 
‘Whenever my husband returns home from the field, forest or village, I stand up and greet him; and offer him a seat and water to welcome him.॥ 25॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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