श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 233: द्रौपदीका सत्यभामाको सती स्त्रीके कर्तव्यकी शिक्षा देना  »  श्लोक 23
 
 
श्लोक  3.233.23 
देवो मनुष्यो गन्धर्वो युवा चापि स्वलंकृत:।
द्रव्यवानभिरूपो वा न मेऽन्य: पुरुषो मत:॥ २३॥
 
 
अनुवाद
चाहे वह कैसा भी मनुष्य हो - देवता, मनुष्य, गन्धर्व, युवक, सुन्दर वेषधारी, धनवान अथवा अत्यंत सुन्दर पुरुष - मेरा मन पाण्डवों को छोड़कर अन्यत्र कहीं नहीं जाता। 23॥
 
No matter what kind of man he is, a god, a human being, a Gandharva, a young man, a well-dressed man, a rich man or a very handsome man, my mind does not go anywhere else except the Pandavas. 23॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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