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श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 232: कार्तिकेयके प्रसिद्ध नामोंका वर्णन तथा उनका स्तवन  »  श्लोक 2
 
 
श्लोक  3.232.2 
वैशम्पायन उवाच
इत्युक्त: पाण्डवेयेन महात्मा ऋषिसंनिधौ।
उवाच भगवांस्तत्र मार्कण्डेयो महातपा:॥ २॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायनजी कहते हैं- जनमेजय! पाण्डुनन्दन युधिष्ठिर की यह बात सुनकर महान तपस्वी महात्मा भगवान मार्कण्डेय ने ऋषियों से इस प्रकार कहा॥2॥
 
Vaishampayanji says – Janamejaya! On hearing this from Pandunandan Yudhishthir, the great ascetic Mahatma Lord Markandeya said to the sages thus: 2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)