श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 232: कार्तिकेयके प्रसिद्ध नामोंका वर्णन तथा उनका स्तवन  »  श्लोक 15
 
 
श्लोक  3.232.15 
सहस्रशीर्षस्त्वमनन्तरूप:
सहस्रपात् त्वं गुह शक्तिधारी।
गङ्गासुतस्त्वं स्वमतेन देव
स्वाहामहीकृत्तिकानां तथैव॥ १५॥
 
 
अनुवाद
आपके हजारों सिर हैं। आपकी सुन्दरता का कोई अंत नहीं है। आपके हजारों पैर हैं। गुह! आपमें शक्ति है। देवा! आपकी इच्छानुसार आप गंगा, स्वाहा, पृथ्वी और कृत्तिकाओं के पुत्र रूप में प्रकट हुए हैं। ॥15॥
 
You have thousands of heads. There is no end to your beauty. You have thousands of feet. Guha! You possess power. Deva! According to your wish, you have appeared as the son of Ganga, Swaha, Earth and Krittikas. ॥15॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)