श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 232: कार्तिकेयके प्रसिद्ध नामोंका वर्णन तथा उनका स्तवन  »  श्लोक 13
 
 
श्लोक  3.232.13 
त्वं पुष्कराक्षस्त्वरविन्दवक्त्र:
सहस्रवक्त्रोऽसि सहस्रबाहु:।
त्वं लोकपाल: परमं हविश्च
त्वं भावन: सर्वसुरासुराणाम्॥ १३॥
 
 
अनुवाद
आप कमल-नेत्र, कमल-मुख, सहस्रमुख और सहस्रभुज हैं। आप जगत के रक्षक, श्रेष्ठ यज्ञ और समस्त देवताओं तथा दानवों के रक्षक हैं॥13॥
 
You are lotus-eyed, lotus-faced, thousand-faced and thousand-armed. You are the protector of the world, the best offering and the protector of all the gods and demons.॥ 13॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)