vedamrit
Reset
Home
ग्रन्थ
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण
श्रीमद् भगवद गीता
______________
श्री विष्णु पुराण
श्रीमद् भागवतम
______________
श्रीचैतन्य भागवत
वैष्णव भजन
About
Contact
श्री महाभारत
»
पर्व 3: वन पर्व
»
अध्याय 231: स्कन्दद्वारा स्वाहादेवीका सत्कार, रुद्रदेवके साथ स्कन्द और देवताओंकी भद्रवट-यात्रा, देवासुर-संग्राम, महिषासुर-वध तथा स्कन्दकी प्रशंसा
»
श्लोक 57
श्लोक
3.231.57
रुद्र उवाच
कार्येष्वहं त्वया पुत्र संद्रष्टव्य: सदैव हि।
दर्शनान्मम भक्त्या च श्रेय: परमवाप्स्यसि॥ ५७॥
अनुवाद
रुद्र बोले - बेटा ! जब भी तुम्हें मेरी आवश्यकता हो, तुम मुझसे अवश्य मिलो । मेरे दर्शन और पूजन से तुम्हें परम कल्याण की प्राप्ति होगी ॥ 57॥
Rudra said - Son! Whenever you need me, you should always meet me. By seeing me and worshipping me, you will attain supreme welfare. ॥ 57॥
✨ ai-generated
Connect Form
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
© 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by acd