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श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 231: स्कन्दद्वारा स्वाहादेवीका सत्कार, रुद्रदेवके साथ स्कन्द और देवताओंकी भद्रवट-यात्रा, देवासुर-संग्राम, महिषासुर-वध तथा स्कन्दकी प्रशंसा  »  श्लोक 52
 
 
श्लोक  3.231.52 
एभिश्च सहितो देवस्तत्र याति यथासुखम्।
अग्रत: पृष्ठतश्चैव न हि तस्य गतिर्ध्रुवा॥ ५२॥
 
 
अनुवाद
इन सबके साथ महादेवजी प्रसन्नतापूर्वक भद्रवत की ओर यात्रा कर रहे थे। कभी वे सेना के आगे होते, कभी पीछे। उनकी कोई निश्चित गति नहीं थी। 52।
 
Along with all these, Mahadevji was happily travelling to Bhadravat. Sometimes he would be in front of the army and sometimes behind it. He did not have any fixed speed. 52.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)