श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 231: स्कन्दद्वारा स्वाहादेवीका सत्कार, रुद्रदेवके साथ स्कन्द और देवताओंकी भद्रवट-यात्रा, देवासुर-संग्राम, महिषासुर-वध तथा स्कन्दकी प्रशंसा  »  श्लोक 43-44
 
 
श्लोक  3.231.43-44 
ऋषयश्चापि देवाश्च गन्धर्वा भुजगास्तथा॥ ४३॥
नद्यो ह्रदा: समुद्राश्च तथैवाप्सरसां गणा:।
नक्षत्राणि ग्रहाश्चैव देवानां शिशवश्च ये॥ ४४॥
 
 
अनुवाद
ऋषिगण, देवता, गन्धर्व, नाग, नदियाँ, गहरे जलाशय, समुद्र, अप्सराएँ, तारे, ग्रह और देवता रुद्रदेव के पीछे-पीछे चल रहे थे ॥43-44॥
 
Sages, gods, Gandharvas, serpents, rivers, deep reservoirs, seas, nymphs, stars, planets and gods were following Rudradev. 43-44॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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