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mahabharat 3.231.38-39h: जल के देवता वरुणदेव हाथ में भयंकर पाश लिए हुए, उस त्रिशूल से उसे चारों ओर से घेरे हुए, धीरे-धीरे चल रहे थे। उनके साथ नाना प्रकार के आकार-प्रकार के जलचर भी थे।   |   mahabharat अध्याय 3.231: स्कन्दद्वारा स्वाहादेवीका सत्कार, रुद्रदेवके साथ स्कन्द और देवताओंकी भद्रवट-यात्रा, देवासुर-संग्राम, महिषासुर-वध तथा स्कन्दकी प्रशंसा   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 231: स्कन्दद्वारा स्वाहादेवीका सत्कार, रुद्रदेवके साथ स्कन्द और देवताओंकी भद्रवट-यात्रा, देवासुर-संग्राम, महिषासुर-वध तथा स्कन्दकी प्रशंसा  »  श्लोक 38-39h
 
 
श्लोक  3.231.38-39h 
तमुग्रपाशो वरुणो भगवान् सलिलेश्वर:॥ ३८॥
परिवार्य शनैर्याति यादोभिर्विविधैर्वृत:।
 
 
अनुवाद
जल के देवता वरुणदेव हाथ में भयंकर पाश लिए हुए, उस त्रिशूल से उसे चारों ओर से घेरे हुए, धीरे-धीरे चल रहे थे। उनके साथ नाना प्रकार के आकार-प्रकार के जलचर भी थे।
 
Lord Varuna, the lord of water, was walking slowly with a dreadful noose in his hand, surrounding him from all sides with that trident. Along with him were aquatic animals of various shapes. 38 1/2
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)