Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7
mahabharat 3.231.113: जो ब्राह्मण एकाग्र मन से स्कंददेव की इस जन्मकथा का पाठ करता है, वह संसार में कल्याण प्राप्त कर अंत में भगवान स्कंद के लोक में जाता है।   |   mahabharat अध्याय 3.231: स्कन्दद्वारा स्वाहादेवीका सत्कार, रुद्रदेवके साथ स्कन्द और देवताओंकी भद्रवट-यात्रा, देवासुर-संग्राम, महिषासुर-वध तथा स्कन्दकी प्रशंसा   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 231: स्कन्दद्वारा स्वाहादेवीका सत्कार, रुद्रदेवके साथ स्कन्द और देवताओंकी भद्रवट-यात्रा, देवासुर-संग्राम, महिषासुर-वध तथा स्कन्दकी प्रशंसा  »  श्लोक 113
 
 
श्लोक  3.231.113 
स्कन्दस्य य इदं विप्र: पठेज्जन्म समाहित:।
स पुष्टिमिह सम्प्राप्य स्कन्दसालोक्यमाप्नुयात्॥ ११३॥
 
 
अनुवाद
जो ब्राह्मण एकाग्र मन से स्कंददेव की इस जन्मकथा का पाठ करता है, वह संसार में कल्याण प्राप्त कर अंत में भगवान स्कंद के लोक में जाता है।
 
The Brahmin who recites this birth story of Skandadev with a concentrated mind, attains prosperity in the world and ultimately goes to the world of Lord Skanda.
 
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि मार्कण्डेयसमास्यापर्वणि आङ्गिरसे स्कन्दोत्पत्तौ महिषासुरवधे एकत्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्याय:॥ २३१॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत मार्कण्डेयसमास्यापर्वमें अंगिरसोपाख्यानके प्रसंगमें स्कन्दकी उत्पत्ति तथा महिषासुरवधविषयक दो सौ एकतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ २३१॥

(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १/२ श्लोक मिलाकर कुल ११३ १/२ श्लोक हैं)
 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)