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mahabharat 3.230.59: राजन! इस प्रकार मैंने ग्रहों के कारण मनुष्यों को होने वाली बाधाओं का संक्षेप में वर्णन किया है। ये ग्रह भगवान महेश्वर के भक्तों को स्पर्श भी नहीं करते।   |   mahabharat अध्याय 3.230: कृत्तिकाओंको नक्षत्रमण्डलमें स्थानकी प्राप्ति तथा मनुष्योंको कष्ट देनेवाले विविध ग्रहोंका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 230: कृत्तिकाओंको नक्षत्रमण्डलमें स्थानकी प्राप्ति तथा मनुष्योंको कष्ट देनेवाले विविध ग्रहोंका वर्णन  »  श्लोक 59
 
 
श्लोक  3.230.59 
इत्येष ते ग्रहोद्देशो मानुषाणां प्रकीर्तित:।
न स्पृशन्ति ग्रहा भक्तान्नरान् देवं महेश्वरम्॥ ५९॥
 
 
अनुवाद
राजन! इस प्रकार मैंने ग्रहों के कारण मनुष्यों को होने वाली बाधाओं का संक्षेप में वर्णन किया है। ये ग्रह भगवान महेश्वर के भक्तों को स्पर्श भी नहीं करते।
 
King! In this way I have briefly described the obstacles that humans face due to the planets. These planets do not even touch those who are devotees of Lord Maheshwar. 59.
 
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि मार्कण्डेयसमास्यापर्वणि आङ्गिरसे मनुष्यग्रहकथने त्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्याय:॥ २३०॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत मार्कण्डेयसमास्यापर्वमें आंगिरसोपाख्यानके प्रसंगमें मनुष्योंको कष्ट देनेवाले ग्रहोंके वर्णनसे सम्बन्ध रखनेवाला दो सौ तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ २३०॥

 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)