Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 3.230.58: जिसने अपनी सम्पूर्ण इन्द्रियों को वश में कर लिया है, जो आत्मसंयमी, शुद्ध, सदा आलस्य से रहित, आस्तिक और भक्त है, उस पुरुष को ग्रह कभी व्याकुल नहीं करते; वे उसे दूर से ही त्याग देते हैं ॥ 58॥ | mahabharat अध्याय 3.230: कृत्तिकाओंको नक्षत्रमण्डलमें स्थानकी प्राप्ति तथा मनुष्योंको कष्ट देनेवाले विविध ग्रहोंका वर्णन । mahabharat पर्व 3: वन पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
अप्रकीर्णेन्द्रियं दान्तं शुचिं नित्यमतन्द्रितम्।
आस्तिकं श्रद्दधानं च वर्जयन्ति सदा ग्रहा:॥ ५८॥
अनुवाद
जिसने अपनी सम्पूर्ण इन्द्रियों को वश में कर लिया है, जो आत्मसंयमी, शुद्ध, सदा आलस्य से रहित, आस्तिक और भक्त है, उस पुरुष को ग्रह कभी व्याकुल नहीं करते; वे उसे दूर से ही त्याग देते हैं ॥ 58॥
The one who has withdrawn all his senses, who is self-controlled, pure, always free from laziness, a believer and a devotee, that person is never disturbed by the planets; they abandon him from a distance. ॥ 58॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥