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mahabharat 3.230.57: ये ग्रह मनुष्यों को सत्तर वर्ष की आयु तक कष्ट देते हैं। उसके बाद ज्वर आदि रोग ग्रहों के समान समस्त प्राणियों को कष्ट देने लगते हैं ॥57॥   |   mahabharat अध्याय 3.230: कृत्तिकाओंको नक्षत्रमण्डलमें स्थानकी प्राप्ति तथा मनुष्योंको कष्ट देनेवाले विविध ग्रहोंका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 230: कृत्तिकाओंको नक्षत्रमण्डलमें स्थानकी प्राप्ति तथा मनुष्योंको कष्ट देनेवाले विविध ग्रहोंका वर्णन  »  श्लोक 57
 
 
श्लोक  3.230.57 
यावत् सप्ततिवर्षाणि भवन्त्येते ग्रहा नृणाम्।
अत: परं देहिनां तु ग्रहतुल्यो भवेज्ज्वर:॥ ५७॥
 
 
अनुवाद
ये ग्रह मनुष्यों को सत्तर वर्ष की आयु तक कष्ट देते हैं। उसके बाद ज्वर आदि रोग ग्रहों के समान समस्त प्राणियों को कष्ट देने लगते हैं ॥57॥
 
These planets trouble human beings till they reach the age of seventy years. After that, diseases like fever etc. start tormenting all living beings like the planets. ॥ 57॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)