श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 230: कृत्तिकाओंको नक्षत्रमण्डलमें स्थानकी प्राप्ति तथा मनुष्योंको कष्ट देनेवाले विविध ग्रहोंका वर्णन  »  श्लोक 55
 
 
श्लोक  3.230.55 
वैक्लव्याच्च भयाच्चैव घोराणां चापि दर्शनात्।
उन्माद्यति स तु क्षिप्रं सान्त्वं तस्य तु साधनम्॥ ५५॥
 
 
अनुवाद
जो मनुष्य चिंता, भय अथवा भयंकर वस्तुओं के दर्शन से पागल हो जाता है, उसे ठीक करने का एकमात्र उपाय उसे सान्त्वना देना ही है ॥55॥
 
A person who becomes insane due to anxiety, fear or the sight of horrible things, the only way to make him well is to console him. ॥ 55॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)