श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 230: कृत्तिकाओंको नक्षत्रमण्डलमें स्थानकी प्राप्ति तथा मनुष्योंको कष्ट देनेवाले विविध ग्रहोंका वर्णन  »  श्लोक 54
 
 
श्लोक  3.230.54 
यस्य दोषै: प्रकुपितं चित्तं मुह्यति देहिन:।
उन्माद्यति स तु क्षिप्रं साधनं तस्य शास्त्रत:॥ ५४॥
 
 
अनुवाद
वात, पित्त और कफ नामक दोषों के बढ़ने से जिसका मन अपनी सुध-बुध खो देता है, वह शीघ्र ही पागल हो जाता है। उसकी चिकित्सा चिकित्सा के अनुसार करनी चाहिए ॥ 54॥
 
A person whose mind loses its senses due to the aggravation of the doshas called Vata, Pitta and Kapha soon becomes insane. He should be treated according to the medical science. ॥ 54॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)