श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 230: कृत्तिकाओंको नक्षत्रमण्डलमें स्थानकी प्राप्ति तथा मनुष्योंको कष्ट देनेवाले विविध ग्रहोंका वर्णन  »  श्लोक 53
 
 
श्लोक  3.230.53 
आविशन्ति च यं यक्षा: पुरुषं कालपर्यये।
उन्माद्यति स तु क्षिप्रं ज्ञेयो यक्षग्रहस्तु स:॥ ५३॥
 
 
अनुवाद
जो व्यक्ति यक्षों से ग्रस्त रहता है, उसे पागल होने में देर नहीं लगती। इसे 'यक्षग्रह' का बाधक समझना चाहिए ॥ 53॥
 
A person who is possessed by Yakshas over a period of time, does not take long to go mad. This should be considered as an obstacle of 'Yakshagraha'. ॥ 53॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)