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श्री महाभारत
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पर्व 3: वन पर्व
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अध्याय 230: कृत्तिकाओंको नक्षत्रमण्डलमें स्थानकी प्राप्ति तथा मनुष्योंको कष्ट देनेवाले विविध ग्रहोंका वर्णन
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श्लोक 52
श्लोक
3.230.52
अधिरोहन्ति यं नित्यं पिशाचा: पुरुषं प्रति।
उन्माद्यति स तु क्षिप्रं ग्रह: पैशाच एव स:॥ ५२॥
अनुवाद
जो व्यक्ति सदैव भूत-प्रेतों से ग्रस्त रहता है, वह शीघ्र ही पागल हो जाता है। अतः वह 'भूतों के भी भूत' का बाधक है। 52.
A person who is always possessed by ghosts also becomes mad very soon. Hence, he is the hindrance of the 'ghost of ghosts'. 52.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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