Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 3.230.50: जो मनुष्य नाना प्रकार की सुगंधियों को सूंघता है और रसों का स्वाद लेता है और तुरन्त ही पागल हो जाता है, उस पर जिस ग्रह का प्रभाव होता है, उसे 'राक्षसग्रह' जानना चाहिए। | mahabharat अध्याय 3.230: कृत्तिकाओंको नक्षत्रमण्डलमें स्थानकी प्राप्ति तथा मनुष्योंको कष्ट देनेवाले विविध ग्रहोंका वर्णन । mahabharat पर्व 3: वन पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
उपाघ्राति च यो गन्धान् रसांश्चापि पृथग्विधान्।
उन्माद्यति स तु क्षिप्रं स ज्ञेयो राक्षसो ग्रह:॥ ५०॥
अनुवाद
जो मनुष्य नाना प्रकार की सुगंधियों को सूंघता है और रसों का स्वाद लेता है और तुरन्त ही पागल हो जाता है, उस पर जिस ग्रह का प्रभाव होता है, उसे 'राक्षसग्रह' जानना चाहिए।
One who smells various fragrances and tastes juices and immediately becomes insane, the planet which influences him should be known as 'Rakshasgraha'.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥