श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 230: कृत्तिकाओंको नक्षत्रमण्डलमें स्थानकी प्राप्ति तथा मनुष्योंको कष्ट देनेवाले विविध ग्रहोंका वर्णन  »  श्लोक 47
 
 
श्लोक  3.230.47 
य: पश्यति नरो देवान् जाग्रद् वा शयितोऽपि वा।
उन्माद्यति स तु क्षिप्रं तं तु देवग्रहं विदु:॥ ४७॥
 
 
अनुवाद
जो ग्रह जागते या सोते समय देवताओं को देखने वाले मनुष्य को कष्ट देता है और तुरन्त उन्मत्त हो जाता है, उसे 'देवग्रह' कहते हैं ॥47॥
 
The planet that causes trouble to a person who sees gods while awake or asleep and immediately goes mad is called 'Devgraha'. ॥ 47॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)