श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 230: कृत्तिकाओंको नक्षत्रमण्डलमें स्थानकी प्राप्ति तथा मनुष्योंको कष्ट देनेवाले विविध ग्रहोंका वर्णन  »  श्लोक 46
 
 
श्लोक  3.230.46 
ऊर्ध्वं तु षोडशाद् वर्षाद् ये भवन्ति ग्रहा नृणाम्।
तानहं सम्प्रवक्ष्यामि नमस्कृत्य महेश्वरम्॥ ४६॥
 
 
अनुवाद
अब मैं भगवान महेश्वर को प्रणाम करता हूँ और उन ग्रहों का परिचय देता हूँ जो सोलह वर्ष की आयु के बाद मनुष्यों के लिए अशुभ होते हैं।
 
I shall now offer my obeisances unto Lord Maheshwara and introduce the planets which are inauspicious for men after the age of sixteen.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)