श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 230: कृत्तिकाओंको नक्षत्रमण्डलमें स्थानकी प्राप्ति तथा मनुष्योंको कष्ट देनेवाले विविध ग्रहोंका वर्णन  »  श्लोक 44
 
 
श्लोक  3.230.44 
तेषां प्रशमनं कार्यं स्नानं धूपमथाञ्जनम्।
बलिकर्मोपहाराश्च स्कन्दस्येज्याविशेषत:॥ ४४॥
 
 
अनुवाद
इन स्कन्दग्रहों को स्नान, धूप, अर्घ्य, यज्ञ, दान तथा स्कन्ददेव की विशेष पूजा करके शांत करना चाहिए ॥44॥
 
These Skandagrahas should be pacified by taking bath, incense, offering prayers, sacrifices, offering gifts and special worship of Skandadev. 44॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)