श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 230: कृत्तिकाओंको नक्षत्रमण्डलमें स्थानकी प्राप्ति तथा मनुष्योंको कष्ट देनेवाले विविध ग्रहोंका वर्णन  »  श्लोक 33
 
 
श्लोक  3.230.33 
गवां माता तु या प्राज्ञै: कथ्यते सुरभिर्नृप।
शकुनिस्तामथारुह्य सह भुङ्‍‍क्ते शिशून् भुवि॥ ३३॥
 
 
अनुवाद
राजन! विद्वान पुरुष जिसे सुरभि कहते हैं, उस गौ पर आरूढ़ होकर शकुनिग्रह-विनता अन्य ग्रहों सहित पृथ्वी के बालकों को खा जाती है॥33॥
 
Rajan! Mounted on the cow which the learned man calls Surabhi, Shakunigraha-Vinata eats the children of the earth along with other planets. 33॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)