श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 230: कृत्तिकाओंको नक्षत्रमण्डलमें स्थानकी प्राप्ति तथा मनुष्योंको कष्ट देनेवाले विविध ग्रहोंका वर्णन  »  श्लोक 25
 
 
श्लोक  3.230.25 
अपतत् सहसा भूमौ विसंज्ञोऽथ क्षुधार्दित:।
स्कन्देन सोऽभ्यनुज्ञातो रौद्ररूपोऽभवद् ग्रह:॥ २५॥
 
 
अनुवाद
जन्म लेते ही वह भूख के कारण पृथ्वी पर मूर्छित होकर गिर पड़ा। फिर स्कन्द की आज्ञा से वह भयानक रूप वाला ग्रह हो गया॥ 25॥
 
As soon as he was born, he fell unconscious on the earth due to hunger. Then by the order of Skanda, he became a planet with a terrifying form.॥ 25॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)