श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 230: कृत्तिकाओंको नक्षत्रमण्डलमें स्थानकी प्राप्ति तथा मनुष्योंको कष्ट देनेवाले विविध ग्रहोंका वर्णन  »  श्लोक 24
 
 
श्लोक  3.230.24 
मार्कण्डेय उवाच
तत: शरीरात् स्कन्दस्य पुरुष: पावकप्रभ:।
भोक्तुं प्रजा: स मर्त्यानां निष्पपात महाप्रभ:॥ २४॥
 
 
अनुवाद
मार्कण्डेयजी कहते हैं - राजन ! तत्पश्चात् स्कन्द के शरीर से अग्नि के समान तेजस्वी और अत्यन्त तेजस्वी एक पुरुष प्रकट हुआ, जो सम्पूर्ण प्रजा को भक्षण करना चाहता था ॥24॥
 
Markandeyaji says- Rajan! Thereafter, from Skanda's body appeared a man as bright as fire and extremely radiant, who wished to devour all the human subjects. 24॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)