श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 230: कृत्तिकाओंको नक्षत्रमण्डलमें स्थानकी प्राप्ति तथा मनुष्योंको कष्ट देनेवाले विविध ग्रहोंका वर्णन  »  श्लोक 22
 
 
श्लोक  3.230.22 
स्कन्द उवाच
यावत् षोडश वर्षाणि भवन्ति तरुणा: प्रजा:।
प्रबाधत मनुष्याणां तावद्रूपै: पृथग्विधै:॥ २२॥
 
 
अनुवाद
स्कंद ने कहा - जब तक संसार के लोग सोलह वर्ष की आयु के न हो जाएं, तब तक तुम जितने चाहो उतने रूप धारण करके मानव जाति को पीड़ा पहुंचा सकते हो।
 
Skanda said - Until the people of the world reach the age of sixteen, you can cause pain to the human race by assuming as many different forms as you want.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)