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mahabharat 3.230.2: यद्यपि वह पतिव्रता स्त्री थी और पतिव्रता धर्म का पालन करने वाली थी, फिर भी ऋषियों ने उसे त्याग दिया था। इसलिए वह शीघ्र ही देवताओं की सेना के स्वामी भगवान स्कंद के पास गई और बोली -॥2॥   |   mahabharat अध्याय 3.230: कृत्तिकाओंको नक्षत्रमण्डलमें स्थानकी प्राप्ति तथा मनुष्योंको कष्ट देनेवाले विविध ग्रहोंका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 230: कृत्तिकाओंको नक्षत्रमण्डलमें स्थानकी प्राप्ति तथा मनुष्योंको कष्ट देनेवाले विविध ग्रहोंका वर्णन  »  श्लोक 2
 
 
श्लोक  3.230.2 
ऋषिभि: सम्परित्यक्ता धर्मयुक्ता महाव्रता:।
द्रुतमागम्य चोचुस्ता देवसेनापतिं प्रभुम्॥ २॥
 
 
अनुवाद
यद्यपि वह पतिव्रता स्त्री थी और पतिव्रता धर्म का पालन करने वाली थी, फिर भी ऋषियों ने उसे त्याग दिया था। इसलिए वह शीघ्र ही देवताओं की सेना के स्वामी भगवान स्कंद के पास गई और बोली -॥2॥
 
Though she was a pious woman and a great follower of chastity, the sages had forsaken her. Therefore she hurried to Lord Skanda, the lord of the army of gods and said -॥ 2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)