|
| |
| |
श्लोक 3.230.14  |
मार्कण्डेय उवाच
अथ मातृगण: सर्व: स्कन्दं वचनमब्रवीत्।
वयं सर्वस्य लोकस्य मातर: कविभि: स्तुता:।
इच्छामो मातरस्तुभ्यं भवितुं पूजयस्व न:॥ १४॥ |
| |
| |
| अनुवाद |
| मार्कण्डेय कहते हैं - हे राजन! तत्पश्चात सभी माताएँ स्कन्द के पास आकर बोलीं - 'बेटा! विद्वानों ने हमें समस्त लोकों की माताएँ कहकर हमारी स्तुति की है। अब हम तुम्हारी माता बनना चाहती हैं। तुम माता के भाव से हमारी पूजा करो।'॥14॥ |
| |
| Markandeya says - O King! Thereafter all the mothers came and said to Skanda - 'Son! The learned have praised us by calling us the mothers of all the worlds. Now we want to become your mother. You should worship us with the feeling of being a mother.'॥ 14॥ |
| ✨ ai-generated |
| |
|