श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 230: कृत्तिकाओंको नक्षत्रमण्डलमें स्थानकी प्राप्ति तथा मनुष्योंको कष्ट देनेवाले विविध ग्रहोंका वर्णन  »  श्लोक 14
 
 
श्लोक  3.230.14 
मार्कण्डेय उवाच
अथ मातृगण: सर्व: स्कन्दं वचनमब्रवीत्।
वयं सर्वस्य लोकस्य मातर: कविभि: स्तुता:।
इच्छामो मातरस्तुभ्यं भवितुं पूजयस्व न:॥ १४॥
 
 
अनुवाद
मार्कण्डेय कहते हैं - हे राजन! तत्पश्चात सभी माताएँ स्कन्द के पास आकर बोलीं - 'बेटा! विद्वानों ने हमें समस्त लोकों की माताएँ कहकर हमारी स्तुति की है। अब हम तुम्हारी माता बनना चाहती हैं। तुम माता के भाव से हमारी पूजा करो।'॥14॥
 
Markandeya says - O King! Thereafter all the mothers came and said to Skanda - 'Son! The learned have praised us by calling us the mothers of all the worlds. Now we want to become your mother. You should worship us with the feeling of being a mother.'॥ 14॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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