श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 230: कृत्तिकाओंको नक्षत्रमण्डलमें स्थानकी प्राप्ति तथा मनुष्योंको कष्ट देनेवाले विविध ग्रहोंका वर्णन  »  श्लोक 12
 
 
श्लोक  3.230.12 
विनता चाब्रवीत् स्कन्दं मम त्वं पिण्डद: सुत:।
इच्छामि नित्यमेवाहं त्वया पुत्र सहासितुम्॥ १२॥
 
 
अनुवाद
गरुड़ जाति की विनता ने स्कन्द से कहा, 'पुत्र! तुम मेरे पिण्डदाता पुत्र हो। मैं सदा तुम्हारे पास रहना चाहती हूँ।'॥12॥
 
Vinata, who belonged to the Garuda caste, said to Skanda, 'Son! You are my Pinddaata son. I want to stay with you forever.'॥ 12॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)