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mahabharat 3.230.1: मार्कण्डेयजी कहते हैं- राजन! कुमार महासेन को समृद्ध और देवताओं का सेनापति होते देख सप्तर्षियों में से छः ऋषियों की पत्नियाँ उनके पास आईं॥1॥   |   mahabharat अध्याय 3.230: कृत्तिकाओंको नक्षत्रमण्डलमें स्थानकी प्राप्ति तथा मनुष्योंको कष्ट देनेवाले विविध ग्रहोंका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 230: कृत्तिकाओंको नक्षत्रमण्डलमें स्थानकी प्राप्ति तथा मनुष्योंको कष्ट देनेवाले विविध ग्रहोंका वर्णन  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक  3.230.1 
मार्कण्डेय उवाच
श्रिया जुष्टं महासेनं देवसेनापतिं कृतम्।
सप्तर्षिपत्न्य: षड् देव्यस्तत्सकाशमथागमन्॥ १॥
 
 
अनुवाद
मार्कण्डेयजी कहते हैं- राजन! कुमार महासेन को समृद्ध और देवताओं का सेनापति होते देख सप्तर्षियों में से छः ऋषियों की पत्नियाँ उनके पास आईं॥1॥
 
Markandeyaji says- Rajan! Seeing Kumar Mahasen becoming prosperous and the commander of the gods, the wives of six of the seven sages came to him. 1॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)