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mahabharat 3.23.6: धर्मराज युधिष्ठिर भी अपने भाइयों सहित प्रसन्न हुए और उन सबसे बातचीत की। कुरुजांगल देश के लोगों की भीड़ देखकर महाबली राजा युधिष्ठिर कुछ देर के लिए वहीं रुक गए।   |   mahabharat अध्याय 3.23: पाण्डवोंका द्वैतवनमें जानेके लिये उद्यत होना और प्रजावर्गकी व्याकुलता   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 23: पाण्डवोंका द्वैतवनमें जानेके लिये उद्यत होना और प्रजावर्गकी व्याकुलता  »  श्लोक 6
 
 
श्लोक  3.23.6 
स चापि तानभ्यवदत् प्रसन्न:
सहैव तैर्भ्रातृभिर्धर्मराज:।
तस्थौ च तत्राधिपतिर्महात्मा
दृष्ट्वा जनौघं कुरुजाङ्गलानाम्॥ ६॥
 
 
अनुवाद
धर्मराज युधिष्ठिर भी अपने भाइयों सहित प्रसन्न हुए और उन सबसे बातचीत की। कुरुजांगल देश के लोगों की भीड़ देखकर महाबली राजा युधिष्ठिर कुछ देर के लिए वहीं रुक गए।
 
Dharmaraja Yudhishthira, along with his brothers, was also pleased and talked to all of them. Seeing the crowd of people of Kurujangala country, the great king Yudhishthira stopped there for a while.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)