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mahabharat 3.23.11: 'वे अचिन्त्य धर्मराज युधिष्ठिर अब अपने उस नगर को छोड़कर कहाँ जा रहे हैं, जिन्होंने अपने ही पुरुषार्थ से भगवान शिव के कैलाश नगर के समान सुन्दर, अतुलनीय इन्द्रप्रस्थ नगर बसाया था?॥ 11॥   |   mahabharat अध्याय 3.23: पाण्डवोंका द्वैतवनमें जानेके लिये उद्यत होना और प्रजावर्गकी व्याकुलता   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 23: पाण्डवोंका द्वैतवनमें जानेके लिये उद्यत होना और प्रजावर्गकी व्याकुलता  »  श्लोक 11
 
 
श्लोक  3.23.11 
स्वयं निवेश्याप्रतिमं महात्मा
पुरं महादेवपुरप्रकाशम्।
शतक्रतुप्रस्थममेयकर्मा
हित्वा प्रयात: क्व नु धर्मराज:॥ ११॥
 
 
अनुवाद
'वे अचिन्त्य धर्मराज युधिष्ठिर अब अपने उस नगर को छोड़कर कहाँ जा रहे हैं, जिन्होंने अपने ही पुरुषार्थ से भगवान शिव के कैलाश नगर के समान सुन्दर, अतुलनीय इन्द्रप्रस्थ नगर बसाया था?॥ 11॥
 
'Where is that inconceivable Dharmaraja Yudhishthir going now, leaving behind that city of his, who by his own efforts had founded the incomparable Indraprastha city, which was as beautiful as that of Lord Shiva's city, Kailash?॥ 11॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)