श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 229: स्कन्दका इन्द्रके साथ वार्तालाप, देवसेनापतिके पदपर अभिषेक तथा देवसेनाके साथ उनका विवाह  »  श्लोक 46-48
 
 
श्लोक  3.229.46-48 
स्कन्दं प्रोवाच बलभिदियं कन्या सुरोत्तम॥ ४६॥
अजाते त्वयि निर्दिष्टा तव पत्नी स्वयम्भुवा।
तस्मात् त्वमस्या विधिवत् पाणिं मन्त्रपुरस्कृतम्॥ ४७॥
गृहाण दक्षिणं देव्या: पाणिना पद्मवर्चसा।
एवमुक्त: स जग्राह तस्या: पाणिं यथाविधि॥ ४८॥
 
 
अनुवाद
तब सेनाओं का संहार करने वाले इन्द्र ने स्कन्द से कहा - 'सुरश्रेष्ठ! आपके जन्म से पूर्व ही ब्रह्माजी ने इस कन्या को आपकी पत्नी के रूप में नियुक्त किया था, अतः आप वेद मन्त्रों का उच्चारण करके विधिपूर्वक इससे विवाह करें। कमल के समान तेजस्वी इस देवी का दाहिना हाथ पकड़ें।' इन्द्र के ऐसा कहने पर स्कन्द ने विधिपूर्वक देवसेना की शपथ ली ॥46-48॥
 
Then Indra, the destroyer of forces, said to Skanda - 'Sureshrestha! Even before you were born, Lord Brahma had appointed this girl as your wife, hence you should formally marry her by reciting the Veda mantras. Hold the right hand of this goddess with your hand shining like a lotus.' On this saying of Indra, Skanda formally took the oath of Devasena. 46-48॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)