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mahabharat 3.229.36-37: राजन! बल, धर्म, बल, तेज, कांति, सत्य, उन्नति, ब्राह्मणभक्ति, मोह (विवेक), भक्तों की रक्षा, शत्रुओं का नाश और सम्पूर्ण लोकों का पालन-पोषण- ये सब गुण स्कन्द के साथ उत्पन्न हुए थे ॥36-37॥   |   mahabharat अध्याय 3.229: स्कन्दका इन्द्रके साथ वार्तालाप, देवसेनापतिके पदपर अभिषेक तथा देवसेनाके साथ उनका विवाह   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 229: स्कन्दका इन्द्रके साथ वार्तालाप, देवसेनापतिके पदपर अभिषेक तथा देवसेनाके साथ उनका विवाह  »  श्लोक 36-37
 
 
श्लोक  3.229.36-37 
शक्तिर्धर्मो बलं तेज: कान्तत्वं सत्यमुन्नति:।
ब्रह्मण्यत्वमसम्मोहो भक्तानां परिरक्षणम्॥ ३६॥
निकृन्तनं च शत्रूणां लोकानां चाभिरक्षणम्।
स्कन्देन सह जातानि सर्वाण्येव जनाधिप॥ ३७॥
 
 
अनुवाद
राजन! बल, धर्म, बल, तेज, कांति, सत्य, उन्नति, ब्राह्मणभक्ति, मोह (विवेक), भक्तों की रक्षा, शत्रुओं का नाश और सम्पूर्ण लोकों का पालन-पोषण- ये सब गुण स्कन्द के साथ उत्पन्न हुए थे ॥36-37॥
 
Rajan! Power, religion, strength, brightness, radiance, truth, progress, devotion to Brahmins, disillusionment (discretion), protection of devotees, destruction of enemies and maintenance of all the worlds – all these qualities were born with Skanda. 36-37॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)