श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 229: स्कन्दका इन्द्रके साथ वार्तालाप, देवसेनापतिके पदपर अभिषेक तथा देवसेनाके साथ उनका विवाह  »  श्लोक 15-16
 
 
श्लोक  3.229.15-16 
शक्र उवाच
बलं तवाद्‍भुतं वीर त्वं देवानामरीन् जहि।
अवज्ञास्यन्ति मां लोका वीर्येण तव विस्मिता:॥ १५॥
इन्द्रत्वे तु स्थितं वीर बलहीनं पराजितम्।
आवयोश्च मिथो भेदे प्रयतिष्यन्त्यतन्द्रिता:॥ १६॥
 
 
अनुवाद
इन्द्र बोले - हे वीर! तुम्हारा बल अद्भुत है, अतः तुम्हें ही देवताओं के शत्रुओं का संहार करना चाहिए । हे वीर! मैं तुम्हारे सामने पराजित होकर दुर्बल सिद्ध हुआ हूँ । अतः लोग तुम्हारे पराक्रम से चकित होकर मेरी उपेक्षा करेंगे । यदि मैं इन्द्र के सिंहासन पर भी बैठा दिया जाऊँ, तो भी सब लोग मेरा उपहास करेंगे और अपना आलस्य छोड़कर हम दोनों में फूट डालने का प्रयत्न करेंगे ॥ 15-16॥
 
Indra said - O brave one! Your strength is amazing, so you only should kill the enemies of the gods. O brave one! I have been defeated in front of you and have proved to be weak. Therefore, people will ignore me, astonished at your valour. Even if I am placed on Indra's throne, everyone will make fun of me and leaving their laziness, they will try to create a rift between us.॥ 15-16॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)