स्कन्द उवाच
शाधि त्वमेव त्रैलोक्यमव्यग्रो विजये रत:।
अहं ते किङ्कर: शक्र न ममेन्द्रत्वमीप्सितम्॥ १४॥
अनुवाद
स्कन्द ने कहा- हे इन्द्रदेव! आप स्वस्थ मन से तीनों लोकों पर शासन करें और विजय प्राप्ति के कार्य में लगे रहें। मैं आपका सेवक हूँ। मैं इन्द्र बनना नहीं चाहता॥ 14॥
Skanda said— O Indradev! You should rule the three worlds with a healthy mind and remain engaged in the task of achieving victory. I am your servant. I do not wish to become Indra.॥ 14॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)