श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 226: विश्वामित्रका स्कन्दके जातकर्मादि तेरह संस्कार करना और विश्वामित्रके समझानेपर भी ऋषियोंका अपनी पत्नियोंको स्वीकार न करना तथा अग्निदेव आदिके द्वारा बालक स्कन्दकी रक्षा करना  »  श्लोक 22-23
 
 
श्लोक  3.226.22-23 
तमप्रतिबलं दृष्ट्वा विषण्णवदनास्तु ता:॥ २२॥
अशक्योऽयं विचिन्त्यैवं तमेव शरणं ययु:।
ऊचुश्चैनं त्वमस्माकं पुत्रो भव महाबल॥ २३॥
 
 
अनुवाद
किन्तु स्कन्द का अतुलनीय बल देखकर उसका मुख उदास हो गया। वह सोचने लगी, ‘इस वीर को पराजित करना असम्भव है।’ ऐसा निश्चय करके वह उनकी शरण में गई और बोली, ‘महाबली कुमार! तुम मेरे पुत्र बन जाओ, मुझे अपनी माता के रूप में स्वीकार करो।’
 
But on seeing Skanda's matchless strength, her face became sad. She started thinking, 'It is impossible to defeat this brave man.' Having made this determination, she went to him for refuge and said, 'Mahabali Kumar! You become my son, accept me as your mother.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)