मार्कण्डेय उवाच
स्कन्दं श्रुत्वा तदा देवा वासवं सहिताऽब्रुवन्॥ १७॥
अविषह्यबलं स्कन्दं जहि शक्राशु माचिरम्।
यदि वा न निहंस्येनं देवेन्द्रोऽयं भविष्यति॥ १८॥
त्रैलोक्यं संनिगृह्यास्मांस्त्वां च शक्र महाबल।
अनुवाद
मार्कण्डेय कहते हैं - राजन! उस समय स्कन्द के जन्म और उनके पराक्रम का समाचार सुनकर समस्त देवता एकत्रित हुए और इन्द्र से बोले - 'देवराज! स्कन्द का पराक्रम असह्य है। उसे शीघ्र ही मार डालो; विलम्ब न करो। हे पराक्रमी इन्द्र! यदि तुम उसे अभी नहीं मारोगे, तो वह तीनों लोकों को, हम सबको और तुम्हें भी अपने अधीन कर लेगा और 'देवेन्द्र' हो जाएगा।' 17-18 1/2।
Markandeya says - King! At that time, on hearing the news of Skanda's birth and his might, all the gods gathered and said to Indra - 'Lord of gods! Skanda's strength is unbearable. Kill him soon; do not delay. Mighty Indra! If you do not kill him now, then he will subjugate the three worlds, all of us and you as well and will become 'Devendra'. 17-18 1/2.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)