श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 226: विश्वामित्रका स्कन्दके जातकर्मादि तेरह संस्कार करना और विश्वामित्रके समझानेपर भी ऋषियोंका अपनी पत्नियोंको स्वीकार न करना तथा अग्निदेव आदिके द्वारा बालक स्कन्दकी रक्षा करना  »  श्लोक 14-15
 
 
श्लोक  3.226.14-15 
षड्वक्त्रस्य तु माहात्म्यं कुक्‍कुटस्य तु साधनम्।
शक्त्या देव्या: साधनं च तथा पारिषदामपि॥ १४॥
विश्वामित्रश्चकारैतत् कर्म लोकहिताय वै।
तस्मादृषि: कुमारस्य विश्वामित्रोऽभवत् प्रिय:॥ १५॥
 
 
अनुवाद
स्कन्द का तेज, उनका पक्षी-धारण, देवी के समान प्रबल शक्ति का ग्रहण तथा दरबारियों का चयन आदि कुमार के सभी कार्य विश्वामित्र ने लोक-कल्याण के लिए आवश्यक सिद्ध किए। अतः ऋषि विश्वामित्र कुमार को अधिक प्रिय हो गए॥14-15॥
 
The glory of Skanda, his wearing of the bird, his acceptance of the powerful power like that of the Goddess and the selection of the courtiers etc. all the acts of Kumar were proved necessary by Vishwamitra for the welfare of the people. Hence, sage Vishwamitra became more dear to Kumar.॥14-15॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)