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mahabharat 3.225.7: मार्कण्डेयजी कहते हैं- राजन! तब अग्निदेव ने प्रेम और प्रसन्नतापूर्वक शिवजी को अपने हृदय में धारण कर लिया। देवी स्वाहा (शिवस्वरूप) ने प्रेमपूर्वक अग्निदेव के साथ समागम किया और उनका वीर्य अपने हाथ में ले लिया। 7॥   |   mahabharat अध्याय 3.225: स्वाहाका मुनिपत्नियोंके रूपोंमें अग्निके साथ समागम, स्कन्दकी उत्पत्ति तथा उनके द्वारा क्रौंच आदि पर्वतोंका विदारण   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 225: स्वाहाका मुनिपत्नियोंके रूपोंमें अग्निके साथ समागम, स्कन्दकी उत्पत्ति तथा उनके द्वारा क्रौंच आदि पर्वतोंका विदारण  »  श्लोक 7
 
 
श्लोक  3.225.7 
मार्कण्डेय उवाच
ततोऽग्निरुपयेमे तां शिवां प्रीतिमुदायुत:।
प्रीत्या देवी समायुक्ता शुक्रं जग्राह पाणिना॥ ७॥
 
 
अनुवाद
मार्कण्डेयजी कहते हैं- राजन! तब अग्निदेव ने प्रेम और प्रसन्नतापूर्वक शिवजी को अपने हृदय में धारण कर लिया। देवी स्वाहा (शिवस्वरूप) ने प्रेमपूर्वक अग्निदेव के साथ समागम किया और उनका वीर्य अपने हाथ में ले लिया। 7॥
 
Markandeyaji says- Rajan! Then Agnidev embraced Shiva in his heart with love and happiness. Goddess Swaha (in the form of Shiva) lovingly mated with Agnidev and took his semen in her hand. 7॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)