श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 225: स्वाहाका मुनिपत्नियोंके रूपोंमें अग्निके साथ समागम, स्कन्दकी उत्पत्ति तथा उनके द्वारा क्रौंच आदि पर्वतोंका विदारण  »  श्लोक 4
 
 
श्लोक  3.225.4 
अग्निरुवाच
कथं मां त्वं विजानीषे कामार्तमितरा: कथम्।
यास्त्वया कीर्तिता: सर्वा: सप्तर्षीणां प्रिया: स्त्रिय:॥ ४॥
 
 
अनुवाद
अग्नि ने पूछा - देवि! आप तथा अन्य सप्तर्षियों की प्रिय पत्नियाँ, जिनकी चर्चा आपने अभी की है, यह कैसे जानती हैं कि मैं आप सबके प्रति काम-पीड़ा से पीड़ित हूँ?॥4॥
 
Agni asked - Devi! How do you and all the beloved wives of the other Saptarishis, about whom you have just discussed, know that I am suffering from lust for you all? ॥ 4॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)