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mahabharat 3.225.39: तत्पश्चात् पर्वतों ने भी उनके चरणों में सिर झुकाया और वे पुनः पृथ्वी पर आ गए। तब से लोग प्रत्येक मास की शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को स्कंददेव की पूजा करने लगे॥39॥   |   mahabharat अध्याय 3.225: स्वाहाका मुनिपत्नियोंके रूपोंमें अग्निके साथ समागम, स्कन्दकी उत्पत्ति तथा उनके द्वारा क्रौंच आदि पर्वतोंका विदारण   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 225: स्वाहाका मुनिपत्नियोंके रूपोंमें अग्निके साथ समागम, स्कन्दकी उत्पत्ति तथा उनके द्वारा क्रौंच आदि पर्वतोंका विदारण  »  श्लोक 39
 
 
श्लोक  3.225.39 
पर्वताश्च नमस्कृत्य तमेव पृथिवीं गता:।
अथैनमभजल्लोक: स्कन्दं शुक्लस्य पञ्चमीम्॥ ३९॥
 
 
अनुवाद
तत्पश्चात् पर्वतों ने भी उनके चरणों में सिर झुकाया और वे पुनः पृथ्वी पर आ गए। तब से लोग प्रत्येक मास की शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को स्कंददेव की पूजा करने लगे॥39॥
 
After that the mountains also bowed their heads at his feet and they again came to earth. Since then people started worshiping Skandadev on the fifth day of Shukla Paksha of every month. 39॥
 
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि मार्कण्डेयसमास्यापर्वणि आंगिरसे कुमारोत्पत्तौ पञ्चविंशत्यधिकद्विशततमोऽध्याय:॥ २२५॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत मार्कण्डेयसमास्यापर्वमें आङ्गिरसोपाख्यानके प्रसंगमें

कुमारोत्पत्तिविषयक दो सौ पचीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ २२५॥ (दाक्षिणात्य अधिक पाठका १/२ श्लोक मिलाकर कुल ३९ १/२ श्लोक हैं)
 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)